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मृत्यु

  हे मृत्यु, तैयार यदि तू आने को , प्रसन्न मुखा। द्वार खुला, है तेरा स्वागत, प्रसन्न मुखा।। आज सत्य के नाम पर मनुष्य केवल मृत्यु को ही समझते हैस। मृत्यु अटल है, किंतु उस बीच में जितने पुरुषार्थ करने होते है, अब मरना ही तो है सोच के माया और मिथ्या आडंबर में फंसा  लेते है खुद को।  जन्म और मरण के मध्य निष्काम कर्म और गृहस्थ जीवन सहित योग साधना अति आवश्यक है। कर्म हीन मनुष्य सदैव रोगी ही रहेगा। आज देखिए कलयुग का प्रभाव पहले पानी कुआं, हैंडपंप आदि के माध्यम से मिल जाता था आसानी से अब बिसालरी के रूप में बिकती है। ये कविता मात्रा नहीं जीवन के बीच के पुरुषार्थ है। जो कठिन है, असंभव नहीं। ~ प्रकाश राठौर 🌅

तिहार के महत्ता, आडंबर या आचरण

 होली है भाई होली, ये अवसर है होलिका दहन का, अंत बुरे का नहीं बुराई का। होलिका एक चरित्र है, कर्तव्य परायण तो वो भी थी।। अवसर है, सही और ग़लत कर्तव्यों के चयन का। अपने  अहंकार को तज के, प्रहलाद को ममतामई गोद में बिठाने का।। होलिका जली, मुक्ति मिली।।।।  लाई खुशियां, भक्ति मिली।।।। रंगो ने भर दिए, हर एक भेद।। इसलिए बुरा ना मानो, मत करो खेद।।। होली की मस्ती भरी प्रकाश से ओतप्रोत शुभकामनाएं।।। होलिका जिस संभावित ग्राम में जन्म ली आज भी उन्हें बेटी की तरह पूजा जाता है, उन्हें अहंकार था, जो की उनके अग्नि द्वारा दमन के साथ अंत हुआ, किंतु आज भी हम होलिका दहन के अवसर पर अपने दुष्ट आचरण को नहीं जला पाते।   ~ प्रकाश राठौर 🌄

मां ( तेरी खयाल आती है)

 मां, हम सब की मां में एक बात उभयनिष्ट है,वो है कि वो सिर्फ मां है, उसके बाद गुरु बनती है। बचपन की कुछ बाते आज याद करके सुकून मिलती है, कैसे कुछ गलती करने के बाद मां के सामने सिजदा और पेबोश करने लगते थे, पता था अब यही है जो सजा ए कुव्वत से बचा सकती है। वो दिन जब कोई बाहर का व्यक्ति हम पे उंगली उठाता तब वह लौह रक्त की नीति अपना लेती थी। जब हम भाई बहनों में झगड़ा होता तो गुट निरपेक्ष ता का नीति अपनाती। स्कूल भेजते समय, हमे तैयार करते समय पंचशील का पाठ पढ़ाया करती। पूजा करते समय तो अकबर का इबादतगाह भी फेल हो जाए। ~प्रकाश राठौर 🌅

खयाल आती है।।।

 ख़यालो को कविता बनाने दो। फुर्सत के पल मिले है, नजर ना लगे काला टीका तो लगाने दो।। उलझा है, जिंदगी का सफर,  डगमगा रही है साइकिल, सपोर्ट है बेअसर, साथ में चलने के लिए एक्स्ट्रा चक्के तो लगाने दो। रुको तो सही, ख़यालो को कविता बनाने दो। ~ प्रकाश राठौर