मृत्यु

 

हे मृत्यु, तैयार यदि तू आने को , प्रसन्न मुखा।

द्वार खुला, है तेरा स्वागत, प्रसन्न मुखा।।

आज सत्य के नाम पर मनुष्य केवल मृत्यु को ही समझते हैस। मृत्यु अटल है, किंतु उस बीच में जितने पुरुषार्थ करने होते है, अब मरना ही तो है सोच के माया और मिथ्या आडंबर में फंसा  लेते है खुद को। 

जन्म और मरण के मध्य निष्काम कर्म और गृहस्थ जीवन सहित योग साधना अति आवश्यक है। कर्म हीन मनुष्य सदैव रोगी ही रहेगा। आज देखिए कलयुग का प्रभाव पहले पानी कुआं, हैंडपंप आदि के माध्यम से मिल जाता था आसानी से अब बिसालरी के रूप में बिकती है।

ये कविता मात्रा नहीं जीवन के बीच के पुरुषार्थ है। जो कठिन है, असंभव नहीं।

~ प्रकाश राठौर 🌅


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