मां ( तेरी खयाल आती है)
मां, हम सब की मां में एक बात उभयनिष्ट है,वो है कि वो सिर्फ मां है, उसके बाद गुरु बनती है।
बचपन की कुछ बाते आज याद करके सुकून मिलती है, कैसे कुछ गलती करने के बाद मां के सामने सिजदा और पेबोश करने लगते थे, पता था अब यही है जो सजा ए कुव्वत से बचा सकती है। वो दिन जब कोई बाहर का व्यक्ति हम पे उंगली उठाता तब वह लौह रक्त की नीति अपना लेती थी। जब हम भाई बहनों में झगड़ा होता तो गुट निरपेक्ष ता का नीति अपनाती। स्कूल भेजते समय, हमे तैयार करते समय पंचशील का पाठ पढ़ाया करती। पूजा करते समय तो अकबर का इबादतगाह भी फेल हो जाए।
~प्रकाश राठौर 🌅
मां सच में मां होती है दोस्त
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